बेरोजगारी उन्मुलन में राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों का योगदान
(छŸाीसगढ़ राज्य के संदर्भ में)
हेमंत शर्मा
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर
सरांश
पृथ्वी की दो तिहाई भूमि भाग जल से परिपूरित है और शेष एक चैथाई भूमि भाग का 40 प्रतिशत भूमि वनों से आच्छादित है। वन और मानव का संबंध मानव के उस काल से जुड़ा है, जब मानव बानर के रूप में जीवन व्यतीत करते थे। इन्हीं वनों में मानव ने बानर से मानव तक के सभ्यता की यात्रा की। पाषाण युग से वैदिक काल तक मानव वनों पर आश्रित हुआ करता था। वैदिक काल में मानव ने वनों के लाभदायी गुणों से परिचय प्राप्त किया और दवाइयों के रूप में उपयोग करने के लिए जड़ी-बुटियों को प्रयोग में लाना प्रारंभ किया। वन-सम्पदा से आय प्राप्त करने की दिशा में पहला वर्णन कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। यह चन्द्रगुप्त मौर्य का शासनकाल था, जो 273 ई.पू. वर्षों में स्थापित था। मौर्य के शासनकाल के बाद के शासकों ने वन-सम्पदाओं से प्राप्ति का लेखा-जोखा रखना प्रारंभ किया। वनों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का कार्य मौर्य के शासनकाल में ही हो गया था, जब मौर्यकाल में वनों की सुरक्षा के लिए वनपालों की नियुक्ति की गई। मानव-सभ्यता के चरणों में वनों का निरंतर ह्नास भी हुआ, जिस पर मुगलकाल में बादशाह अकबर ने रोक लगाने और वनों के महत्व को बनाए रखने वृक्षारोपण को महत्व दिया, किंतु मुगलकाल में वनों के स्थान पर वृक्षारोपण राज्य की सड़कों एवं नहरों के किनारे पर लगाने को ज्यादा महत्व दिया गया।
प्रारंभिक ब्रिटिश काल में वनों की सुरक्षा और उसके उत्पादों के दोहन से प्राप्त आय की रक्षा के लिए ठोस मानवीय प्रयास प्रारंभ किए गए, यही वह काल था जब वनों से रोजगार की संभावना को बल मिला।
परिभाषा
‘‘वन उस भूमि को कहा जाता है जिसका विभिन्न वन संबंधी प्रयोजनों के लिए प्रबंध किया जाता है, चाहे वह वृक्ष, झाड़ियों, लताओं आदि से आच्छादित हो या न हो।’’
‘‘प्रबंधित सम्पŸिा के समूहों को ‘वन’ कहते हैं। बेढ़ंगे तौर पर उगे पेड़-झाड़ियों के झुंड को जंगल कहते हैं।’’
‘‘कानून में उस प्रदेश विशेष और उस पर उगी वनस्पति को वन कहा जाता है, जो विधिवत ऐसा घोषित किया गया हो।’’
‘‘वन का पर्याय ‘अरण्य’ का अर्थ होता है, वह भूमि जिस पर न खेती होती हो न चराई।’’
‘‘वन अर्थात् ‘फारेस्ट’ लैटिन शब्द ‘फोरिस’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘ग्राम सीमा के बाहर’ जिसमें सारी अकृष्ट तथा अनबसी भूमि का समावेश होता है।’’
राष्ट्रीय वनों के प्रकार
भारत की 21.02 प्रतिशत भूमि विविध प्रकार के वनों से आच्छादित है। जहाँ दक्षिण के केरल में वर्षा वन हैं, वहीं उŸार के लद्दाख में पर्वतशीखरीय वन और पश्चिम में हरे-भरे वन। भारत में वनों की विविधता के लिए यहाँ की मिट्टी एवं उसका महत्व प्रमुख कारक है। भारत में कुल 16 प्रकार के वन पाए जाते हैें। वनों की प्रकृति के आधार पर उनका वर्गीकरण निम्नानुसार किया जाता है-
1. नम पर्णपाती वन
2. नम एवं हरा-भरा वन
3. बड़े पŸो वाले वृक्ष-वन
5. देवदार के वन
6. सुखा पर्णपाती वन
7. गीला पर्वतीय वन
8. सुखा पर्वतीय वन
राष्ट्रीय वनों का क्षेत्रफल
वर्ष 2007 में वन-विभाग के किए गए सर्वेक्षण के अनुसार भारत के कुल भूमि के सापेक्ष 69.09 लाख हेक्टेयर भूमि वनों से आच्छादित हैं, जो कुल भूमि के 21.02 प्रतिशत के बराबर है। इससे 8.35 लाख हेक्टेयर भूमि घने वन के रूप में है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल के 2.54 प्रतिशत है। 31.90 लाख हेक्टेयर भूमि परिवर्धित घने वन के रूप में है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 9.71 प्रतिशत है तथा 28.84 लाख हेक्टेयर भूमि खुले वन के रूप में है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल के 8.77 प्रतिशत है। भारत के कुल वन क्षेत्र 21.02 प्रतिशत में छŸाीसगढ़ में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 8.09 प्रतिशत वन भूमि क्षेत्र है।
प्रादेशिक वनों के प्रकार
छŸाीसगढ़ राज्य में चार प्रकार के वन मुख्य रूप से पाए जाते हैं-
1. साल वन
2. सागौन वन
3. बाम्बु वन
4. मिश्रित वन
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|
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Xkksan I |
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|
2001 |
104-17 |
15-28 |
1-82 |
0-12 |
0-28 |
121-67 |
|
2002 |
128-87 |
4-84 |
2-13 |
0-25 |
0-16 |
136-25 |
|
2003 |
115-49 |
42-74 |
1-57 |
0-53 |
0-08 |
160-41 |
|
2004 |
110-29 |
6-24 |
1-51 |
0-82 |
0-12 |
118-98 |
|
2005 |
91-65 |
46-22 |
1-10 |
0-62 |
0-02 |
139-61 |
|
2006 |
97-86 |
2-44 |
1-50 |
0-58 |
0-03 |
102-41 |
|
2007 |
202-86 |
30-32 |
1-17 |
1-49 |
0-05 |
235-89 |
|
2008 |
148-71 |
8-99 |
1-86 |
1-33 |
0-11 |
161-00 |
|
2009 |
189-71 |
88-64 |
1-24 |
2-97 |
0-14 |
282-70 |
|
2010 |
246-81 |
6-72 |
2-21 |
1-18 |
0-20 |
257-12 |
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|
Ok’kZ |
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Lkkycht |
gjkZ |
Xkksan I |
Xkksan II ¼/kkoM+k@[kSj@ ccwy½ |
dqy izkfIr |
|
2001 |
165-22 |
19-60 |
1-50 |
0-13 |
0-16 |
186-61 |
|
2002 |
198-71 |
7-95 |
2-16 |
0-25 |
0-17 |
209-24 |
|
2003 |
173-25 |
21-80 |
1-67 |
0-54 |
0-08 |
197-34 |
|
2004 |
148-50 |
5-35 |
1-53 |
0-85 |
0-13 |
156-36 |
|
2005 |
135-06 |
30-56 |
1-18 |
0-68 |
0-02 |
167-50 |
|
2006 |
140-02 |
3-59 |
1-16 |
0-65 |
0-03 |
145-95 |
|
2007 |
325-59 |
59-09 |
1-44 |
1-51 |
0-06 |
387-69 |
|
2008 |
197-61 |
12-64 |
2-15 |
1-40 |
0-12 |
213-92 |
|
2009 |
256-41 |
51-07 |
1-37 |
3-13 |
0-19 |
312-17 |
|
2010 |
335-30 |
6-76 |
3-01 |
2-17 |
0-23 |
347-45 |
छŸाीसगढ़ राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 41.42 प्रतिशत भूमि वनों से आच्छादित है। छŸाीसगढ़ राज्य के वनों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है-
घने वन
परिवर्धित घने वन
खुले वन
प्रादेशित वनों का क्षेत्रफल
छŸाीसगढ़ प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 135191 वर्ग कि.मी. है, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 4.1 प्रतिशत के बराबर है। संसूचित वन-क्षेत्र को तीन भागों में रखा गया हैै-
आरक्षित वन-क्षेत्र - 25782 वर्ग कि.मी.
सुरक्षित वन-क्षेत्र - 24036 वर्ग कि.मी.
अवर्गीकृत वन-क्षेत्र - 9954 वर्ग कि.मी.
छŸाीसगढ़ राज्य में वनों को उनके घनत्व के आधार पर निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है-
घने वन - 1540 वर्ग कि.मी.
परिवर्धित वन - 37440 वर्ग कि.मी.
खुले वन - 55998 वर्ग कि.मी.
इस तरह कुल आरक्षित, रक्षित एवं अवर्गीकृत वन-क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 59772 वर्ग कि.मी. है, वहीं घनत्व के आधार पर खुले, परिवर्धित एवं घने वनों का कुल क्षेत्रफल 55998 वर्ग कि.मी. है। वर्ष 2001 और 2003 में प्राप्त आंकड़े प्रदर्शित करते हैं कि इस मध्य जहाँ घने वन 1100 वर्ग कि.मी. बढ़े हैं, वहीं खुले वनों में 1550 वर्ग कि.मी. की कमी आई है।
लघुवनोपनों एवं उनका उपयोग
छŸाीसगढ़ प्रदेश के वनों से प्राप्त होने वाले लघुवन उपज-
राष्ट्रीयकृत-तेंदुपŸाा, सालबीज, हर्रा, गोंद, घावड़ा, बबूल और खैर
अराष्ट्रीयकृत-इमली, महुआ, लाख, माहुलपŸिा एवं चिरौंजी।
वनौषधियाँ-बायबिडंग, रंजीरा, कालमेध, आँवला, शहद एवं 19 तरह की जड़ी बुटियाँ,बेलगुदा, मरोरफली, मैनफल, सिकाकाई, रीठा, कालमेल, नागरमोथा, सफेद मूसली, निर्मली, बैचांदी, मैदा छाल, अर्जुन छाल।
राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों का उपयोग
तेंदुपŸाा-ग्रीष्मकाल में कोमल तेंदुपŸाा को जब वह खड़ी अवस्था में पौधोंमें लगी हो, तोड़कर सुखा लिया जाता है। इस सुखे पŸो में तम्बाखू भरकर बीड़ी उद्योग द्वारा बीड़ी बनाई जाती है।
सालबीज -सालबीजों को ग्रीष्मकाल में ही संग्रहित किया जाता है। सालबीज से साल्वेंट प्लांट द्वारा कोको बटर नामक फैट निकाला जाता है, विदेशों में इसकी बहुत मांग है।
हर्रा -हर्रा एक औषधिय फल है। हर्रा के फलों को आयुर्वेदिक दवाइयाँ बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। हर्रा के फूल जानवरों के चमड़े पकाने में उपयोग में लाया जाता है।
गोंद-गोंद मुख्यतः दो अवस्था में प्राप्त होती है। एक उŸाम अवस्था की गोंद और दूसरी साधारण अवस्था की गोंद। दोनों ही प्रकार के गोंदों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाइयाँ बनाने में किया जाता है। गोंद अति स्वास्थ्वर्धक एवं पौष्टिक होती है।
वनों से रोजगार का इतिहास
वनों का मानव को अपने उत्पादों से कृतार्थ करने का इतिहास बहुत पुराना है, वनों से घर बनाने के लिए इमारती लकड़ी, इंधन के लिए जलाऊ लकड़ी, वनोषधियों का दोहन मानव आदिकाल एवं वैदिक काल से करता आ रहा है। वनों से रोजगार की उपलब्धता पर प्रथम बार मौर्यकाल में विचार किया गया और वनों की सुरक्षा के लिए वन प्रबंधकर्Ÿाा नियुक्त किए गए, जिनके सहयोग के लिए वनपालों की भी नियुक्ति हुई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वनों से प्राप्त विभिन्न प्रकार के लकड़ियों के विक्रय से राज्य को प्राप्त होने वाले आय का भी वर्णन किया गया है। इन लकड़ियों से बढ़ई दरवाज़े, हल, पुल और रथों के पहिये बनाकर रोजगार प्राप्त करते थे। इसी काल में वनपाल वनों से मृत जानवरों के खाल एकत्र कर उन्हें निर्माणशाला में घरेलु उपयोग की सामग्री बनाने के लिए जमा कर देते थे, जिससे चर्मकारों को रोजगार प्राप्त होता था। गुप्तकाल और मुगलकाल मेें भी वनों से प्राप्त होने वाले लकड़ियों एवं बांसों के विक्रय किए जाते थे, जो बसवाड़ों और बढ़इयों के लिए रोजगार उपलब्ध कराते थे।
सन् 1800 ई. में दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय वनों की व्यवस्था में पहला कदम उठाया और एक कमीशन का गठन किया, जिसका मुख्य कार्य मालावार के वनों से सागौन के पेड़ों की उपलब्धता की जानकारी एकत्र करना था। सागौन के लकड़ी से रेल्वे का ‘स्लीपर’ बनाया जाने लगा, जिसे ज़मीन पर रखकर उसके ऊपर रेलपाथ बिछाया जाना था। 1922 में भारतीय वन-सेवा का गठन किया गया, जिसमें भारतीयों को भी रोजगार उपलब्ध कराया गया। सन् 1952 में भारत सरकार ने वन अधिनियम बनाया, जो 1894 के वन अधिनियम का विस्तार था। सन् 1969 में मध्यप्रदेश सरकार ने वनों के लघुवनोपजों से आदिवासियों के लिए रोजगार की व्यापक संभावना को देखते हएु मध्यप्रदेश वनोपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969 पारित किया। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वनग्रामों में निवास करने वाले आदिवासियों को वनोपजों पर पहला हक दिलाना था और आदिवासियों के लिए इस माध्यम से रोजगार की संभावना को बढ़ावा देना था।
लघुवनोपज संग्रहण भुगतान
लघुवनोपजों के संग्रहण पर राज्य सरकार संग्रहण के लिए निर्धारित मूल्य के साथ-साथ प्राप्त शुद्ध आय का एक भाग भी लाभांश के रूप में संग्राहकों को देती है। तेंदुपŸाा से चूँकि राजय सरकार को ज्यादा आय प्राप्त होती है, इसलिए इस वनोपज पर राज्य सरकार प्रति स्टैंडर्ड बैग संग्रहण भुगतान रु. 800 के साथ-साथ लाभ में से 80 प्रतिशत राशि का लाभांश के रूप में वितरित करती है। 2000 के पूर्व लाभांश, लाभ की राशि के 70 प्रतिशत तक ही दिया जाता था। वर्तमान में प्रति स्टैंडर्ड बैग न्यूनतम लाभांश रु. 200 दिया जा रहा है। (तालिका क्र. 1)
संग्रहण भुगतान के आंकड़े एवं ग्राफ प्रदर्शित करते हैं कि वर्ष 2001 से वर्ष 2010 के मध्य कमोबेश कुछ एक वर्ष को छोड़कर संग्रहण भुगतान दर एवं कुल संग्रहण भुगतान में वृद्धि हुई है। संग्रहण भुगतान में वृद्धि यह प्रमाणित करती है कि लघुवनोपजों से ग्रामीण रोजगारी में वृद्धि हुई है।
राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों से वार्षिक आय
राष्ट्रीयकृत लघुवनोपज, तेंदुपŸाा, सालबीज, हर्रा, गोंद (सलाई), गोंद (धावड़ा, खैर, बबूल) से वर्ष 2010 में छŸाीसगढ़ शासन को कुल रु. 347.45 करोड़ की आय प्राप्त हुई। वर्ष 2001 से 2010 तक के राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों से प्राप्त आंकड़ा स्पष्ट करता है कि वर्ष 2010 में वर्ष 2001 के सापेक्ष दुगुनी वृद्धि हुई है। यह आंकड़े राज्य सरकार द्वारा संग्रहित लघुवनोपजों के वास्तविक विक्रय से संबंधित है। राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों के आंकड़ों पर आधारित ग्राफ कमोबेश कुछ एक वर्षों को छोड़कर वृद्धि को ही परिलक्षित करता है, इसके दो ही आशय हैं- (तालिका क्र. 2)
1. सरकार द्वारा वनोपजों के अधिकतम दोहन को प्राप्त करना।
2. वनोपजों के संग्रहण में अधिक ग्रामीण आदिवासी परिवारों का सम्मिलित होना।
आगे के अध्याय में दिखाए गए आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि वर्ष 2001 के सापेक्ष वर्ष 2006 एवं वर्ष 2006 के सापेक्ष वर्ष 2010 में लघुवनोपज संग्राहक परिवारों की संख्या में वृद्धि हुई है।
संग्रहण पद्धति
तेंदुपŸाा
तेंदुपŸाा का संग्रहण ग्रीष्मकाल में किया जाता है। पौधें में जब पŸिायाँ अपने आप सीधी खड़ी हो जाती हैं, तो उन्हें पौधों से पृथक कर लिया जाता है। 50 पŸिायों के, जिसमें 25 पŸिायों के डंठल वाला भाग एक तरफ एवं 25 पŸिायों का दूसरी तरफ रखकर बंडल बनाए जाते हैं। इस तरह के एक हजार बंडल का एक स्टैंडर्ड बैग बनता है। तेंदुपŸाा संग्रहण का सबसे उŸाम काल अप्रैल से मई के अंतिम सप्ताह तक का होता है। तेंदुपŸाा संग्राहकों को प्रति परिवार एक कार्ड उपलब्ध कराया जाता है। संग्राहकों द्वारा संग्रहित तेंदुपŸाा प्राथमिक समिति के फड़मुंशी के पास जमा करा कर उसकी प्रविष्टि अपने पारिवारिक संग्रहण कार्ड में कराना होता है।
सालबीज
सालबीज में 13-14 प्रतिशत तेल होता है, जो ‘कोको बटर’ के रूप में प्राप्त होता है। इसे संग्राहकों द्वारा ग्रीष्मकाल में ही संग्रहित किया जाता है। संग्रहित सालबीज प्राथ्मिक समिति के फड़मुंशी के पास जमा करा कर उसकी प्रविष्ठि वनोपज संग्रहण पुस्तिका में करा ली जाती है। इसकी संग्रहण गणना प्रतिकिलों पर की जाती है। सालबीज संग्रहण का सबसे उŸाम समय 15 मई से 15 जुलाई के मध्य का समय होता है।
हर्रा
हर्रा का फल एवं फूल दोनों ही उपयोगी होने के कारण संग्रहित किए जाते हैं। हर्रा फल होने के कारण उसके फलने एवं पकने की अवधि पर संग्रहण योग्य होता है। हर्रा की संग्रहण गणना प्रति किलो के आधार पर ही की जाती है।
गोंद
प्रथम श्रेणी का गोंद ‘कुल्लु’ के वृक्ष से एवं द्वितीय श्रेणी का गोंद खैर, बबूल एवं धावड़ा के वृक्षों से प्राप्त की जाती है। इसका संग्रहण कुशलतापूर्वक किया जाता है।
राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों की संग्रहण व्यवस्था
छŸाीसगढ़ राज्य में राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों के संग्रहण एवं प्रबंधन के लिए एक ढाँचा निर्मित है। यह संग्रहण व्यवस्था प्राथमिक संग्राहकों से प्रारंभ होकर राज्य फेडरेशन तक कार्य करती है।
राज्य फेडरेशन
01
जिला संघ
32
सहकारी समितियाँ
915
संग्रहण केन्द्र
10,000
संग्राहक
13,76,000
संग्राहकों द्वारा संग्रहित लघुवनोपज प्राथमिक समिति अर्थात् संग्रहण केन्द्र पर फड़मुंशी के पास जमा कराया जाता है। प्राथमिक समितियों के माध्यम से इसके भंडारण की व्यवस्था सहकारी समितियों के द्वारा किया जाता है और जिले के संघ द्वारा इन संग्रहित सामग्रियों के विपणन का प्रबंध किया जाता है। इन सभी पर राज्य फेडरेशन नियंत्रण रखता है और समय-समय पर निर्देश प्रदान करने का कार्य करता है।
छŸाीसगढ़ राज्य की ग्रामीण जनसंख्या
जनगणना 2001 के अनुसार छŸाीसगढ़ की कुल जनसंख्या 2.08 करोड़ के सापेक्ष गाँवों में रहने वाले ग्रामीणों की जनसंख्या 1.66 करोड़ है, जो कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत है। छŸाीसगढ़ की कुल जनसंख्या के 31.80 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की है, जिनकी अधिक संख्या वनग्रामों में निवास करती है। वनग्रामों की 25 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आधारित है, तो 5 प्रतिशत जनसंख्या व्यापार-व्यवसाय का कार्य करती है, जबकि ग्रामीण जनसंख्या के 70 प्रतिशत जनसंख्या मजदूरी अथवा लघुवनोपजों के संग्रहण से रोजगार प्राप्त करती है।
रोजगार परिवार की वार्षिक आय
यह मानते हुए कि एक परिवार में 4 सदस्य हैं, परिवार के राष्ट्रीयकृत उल्लेखित लघुवनोपजों से प्राप्त पारिवारिक आय की गणना की गई है, जबकि संग्राहकों की संख्या में निरंतर वृद्धि से परिलक्षित होता है कि ऐसे ग्रामीण आदिवासी जो किसी प्रकार के रोजगार में संलिप्त नहीं हैं, लघुवनोपजों से आय प्राप्त करने के रोजगार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वर्तमान में 13.22 लाख लोगों को इससे रोजगार प्राप्त हो रहा है। (तालिका क्र. 3)
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|
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|
2006 |
102-41 |
12-53 |
3-13 |
3271 |
|
2007 |
235-89 |
12-60 |
3-15 |
7489 |
|
2008 |
161-00 |
12-82 |
3-20 |
5031 |
|
2009 |
282-70 |
12-82 |
3-20 |
8834 |
|
2010 |
257-12 |
13-22 |
3-30 |
7792 |
निष्कर्ष
वनों से प्राप्त होने वाले वन सम्पदाओं में इस शोध-पत्र में केवल राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजों का, जो छŸाीसगढ़ राज्य में उपलब्ध है, से प्राप्त होने वाले आय और इन वनोपजों के संग्रहण से रोजगार प्राप्त करने वालों के संदर्भ में अध्ययन केंद्रित किया गया है, जबकि वनों से प्राप्त होने वाले सम्पदा, इमारती लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, राष्ट्रीयकृत, अराष्ट्रीयकृत लघुवनोपज एवं वनौषधियों के संग्रहण से प्राप्ति पर विस्तृत अध्ययन किया जावे तो यह और भी स्पष्ट होगा कि लघुवनोपजों के संग्रहण, विपणन एवं उपयोग पर आधारित उद्योग लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए आकर्षित करते हैं। जरूरत इस बात की है कि वनोपजों के संग्रहण के लिए बेरोजगारों को पंजीकृत किया जावे एवं उन्हें इस क्षेत्र में वनोपजों के अधिकतम दोहन के लिए प्रशिक्षित किया जावे तो यह क्षेत्र रोजगार उपलब्ध कराने एवं बेरोजगारी उन्मूलन में अपना विशिष्ट योगदान दे सकता है।
स्रोत
1. ूूूण्बहवितमेजण्बवउएूूूण्वितमेजण्बवउ पर उपलब्ध आंकड़े.
2. वन-वानिकी और मानव - कामता प्रसाद सागरीय.
Received on 01.12.2011
Revised on 09.01.2012
Accepted on 20.01.2012
© A&V Publication all right reserved
Research J. Humanities and Social Sciences. 3(1): Jan- March, 2012, 68-72